
बड़े पुण्य कर्म से हमें मानव जीवन प्राप्त हुआ है इसका सदुपयोग कर जीवन को सुखमय बनाएं, ,,आचार्य श्री विभव सागर,,

अचार्य संघ के सानिध्य में नगर में पहली बार भव्य 44 मंडलीय कल्याण मंदिर विधान का आयोजन गुरुवार को।
खंडवा। क्रोध और बैर दुखदाई होकर संसार में भटकाता है, शरीर में विकार से क्रोध की उत्पत्ति होती है, क्रोध रोग का कारण है, क्रोध करने वाला रोगी होता है, रोग रहित व्यक्ति क्षमा धारण करने वाला होता है, जिस प्रकार शरीर की ऊष्मता,पीडा हटाने के लिये बर्फ की सिकाई की आवश्यकता होती है,उसी प्रकार क्रोध एवं बैर के निराकरण के लिये क्षमा आवश्यक है,क्रोध विराधना है तो क्षमा आराधना यानी अमृत है,अज्ञानी व्यक्ति ही क्रोध करता है, यह उद्गार सराफा पोरवाड़ जैन धर्मशाला में कल्याण मंदिर स्तोत्र विवेचना के 13 सूत्र के संदर्भ में खंडवा में विराजमान आचार्य विभव सागर जी महाराज ने व्यक्त किये। आचार्य श्री ने कहा कि व्यापार में क्रोध असफलता का कारण है,यह हम सभी जानते हैं और हम सभी व्यापारी हैं बस व्यापार का तरीका भिन्न है, क्षमा से शक्ति का जागरण होता है, पार्श्वनाथ भगवान क्षमा के सर्वोच्च उदाहरण हैं हम सभी उनके मानने वालो ने कर्म , क्रोध एव़ं मोह को क्षमा एवं भक्ति से नाश करते चलना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि बड़े पुण्य भाव से हमें मानव जीवन प्राप्त हुआ है, इसका सदुपयोग कर अच्छे कर्म करते हुए अपने जीवन को सफल बनाएं। समाज के सचिव सुनील जैन ने बताया कि बड़ा पुण्य अवसर है कि वर्षों के बाद खंडवा समाज को इतने बड़े अचार्य संघ का सानिध्य हमें कुछ दिनों के लिए प्राप्त हुआ है, हम सभी सामाजिक बंधु आचार्य श्री के प्रवचन एवं अनुष्ठानों का लाभ लेकर अपने जीवन को सुख मय बनाएं।
मुनि सेवा समिति के प्रचार मंत्री सुनील जैन , प्रेमांशु चौधरी ने बताया की भव्य 44 मंडलीय श्री कल्याण मन्दिर विधान 18 दिसम्बर गुरुवार को प.पू.सारस्वताचार्य 108 श्री विभवसागर जी ससंघ 20 पीछी के सानिध्य में समय दोपहर 12 बजे से श्री महावीर जिनालय प्रांगण बजरंग चौक खण्डवा में संगीतकार शुभम जैन जबलपुर की संगीतमय टीम के साथ आयोजित होगा। समाज के अध्यक्ष वीरेंद्र जैन, दिलीप पहाड़िया, विजय सेठी ने बताया कि आचार्य संघ के सानिध्य में यहां हमको देव शास्त्र और साक्षात आचार्य परमेष्ठी ससंघ का मंगल सानिध्य और पार्श्वनाथ भगवान की आराधना का अपूर्व अवसर मिल रहा है। आइये जिन धर्म प्रभावना के साथ अपने भावों की विशुद्धि को बढ़ाये।









